Friday, August 16, 2013

दिशाहीन नेतृत्व की देन दिशाहीन युवा !

8 अगस्त 2013 को 'दैनिक हिन्दुस्तान' में अजीब तरह के दुराग्रह में लिपटा सर्वे प्रकाशित हुआ। सर्वे के मुताबिक देश के 52.2 फीसदी युवा तानाशाही व्यवस्था के ख़्वाहिशमंद बताए गए इस तथ्य के साथ कि 75.4 फीसदी युवा मतदान भी करना चाहते हैं। है न विरोधाभासी सर्वे? अरे भईया या तो तानाशाही व्यवस्था को गले लगा लो या फिर जनतंत्र को। ये कैसी व्यवस्था होगी जिसमें 75.4 फीसदी युवा मताधिकार का इस्तेमाल तानाशाही व्यवस्था के लिए करेंगे? सुश्री परमिता घोष के इस सर्वे का सबसे दिलचस्प पहलू तो ये है कि इसमें युवाओं को पहले से ज़्यादा जागरूक बताया गया है। समझ रहे हैं आप, कंफ्यूजन को जागरूकता बताया जा रहा है इससे हास्यास्पद बात भला और क्या हो सकती है?
चाहे इतिहास पुरातन हो या सामयिक तानाशाह किसी भी काल और देश में स्वस्थ्य शासन व्यवस्था नहीं मानी गई है। हमारे पास तो आधुनिक काल से लेकर अबतक के ही इतने ज़्यादा उदाहरण भरे हैं कि तानाशाह के नाम से ही अज़ीब सडांध महसूस होने लगती है। फिर वो युवा जो आर्थिक उदारीकरण के दौर में पले बढ़े या पैदा हुए उनका कितना दम घुटेगा? इसका अंदाज़ा तानाशाह की चाह रखने वाले उन युवाओं को भी नहीं होगा। एकल परिवार के अंदर मां-बाप की टोका-टोकी जिस जेन-एक्स को गवारा नहीं। हर जगह उन्मुक्तता और स्वच्छंदता की चाहत करने वाले युवाओं को, शायद सपनों की दुनिया का तानाशाह चाहिए जो उनके ज़रूरतों के लिए व्यवस्था को गढ़े और युवाओं की कोई ज़िम्मेदारी न हो। और युवा ट्रैफिक के साधारण नियमों तक को न मानें।ऐसा लगता है कि सर्वे में शामिल युवाओं के पास दुनिया की क्या अपने देश की वर्तमान और इतिहास की जानकारी नहीं है। सर्वे में शामिल युवा लंबित मामलों और भ्रष्टाचार से मुक्त देश के लिए तानाशाही व्यवस्था की हिमायत कर रहे हैं। ये बात ख़ुद में कितनी हास्यास्पद है। इस बात की गारंटी कौन तय करेगा कि तानाशाही व्यवस्था भ्रष्टाचाररहित होगी। क्या इन युवाओं ने हाल के दिनों में कई देशों के तानाशाह ख़त्म होते हुए नहीं देखा है? मध्य पूर्व और तमाम दूसरे देशों में शासन चला रहे तानाशाह भ्रष्टाचार की पराकाष्टा पर जीवन जी रहे थे । वहां की आवाम जब घुटन भरी ज़िन्दगी से ऊब गई तब, विद्रोह कर उन्हें ख़त्म कर दिया। क्या सर्वे में शामिल युवा अपने देश को उसी हालात में देखना चाहते हैं? यक़ीनन नहीं।
यहां ये जानना बेहद ज़रूरी है कि कोई भी व्यवस्था पूर्ण नहीं होती और इसमें हर हमेशा बेहतरी की गुंजाइश होती है। अगर व्यवस्था की तुलना इंसानी शरीर से की जाए तो इसे ज़्यादा बेहतर तरीक़े से समझा जा सकता है। जैसे भोजन करने के लिए पूरा शरीर श्रम करता है लेकिन खाने के बाद चर्बी पूरे शरीर में एक बारगी नहीं लगती है वो उन अंगों में पहले लगती है जिनमें हरकत (मुवमेंट) नहीं के बराबर है। यानी जिस अंग की एक्सर्साइज़ ख़ुद नहीं हो रही वहां चर्बी का जमना तय है। और शरीर में जमे चर्बी को हटाने के लिए जिस तरह वर्ज़िश की जाती है वैसे ही भ्रष्टाचारमुक्त व्यवस्था के लिए भी वर्ज़िश ज़रूरी है। ज़रूरत है भ्रष्टाचार की गुंजाइश वाले अंगों की व्यवस्था में पहचान कर उसके लिए सही एक्सर्साइज़ की, न की पूरे व्यवस्था को बदल देने की।हमारा देश बहुत जीवंत है और विविधताओं से भरा-पूरा है। विविधताएं कुछ नैसर्गिक हैं, कुछ बाद में बनाई गईं, जिसे हम सब झेलने को बाध्य हैं। ऐसे में देश की एकता और संप्रभुता बनाए रखने के लिए क़वायदें (सर्वे) होनी चाहिए न कि एक संवदेनशील राष्ट्र की जड़ें खोदने के लिए सतही सर्वे की और छापी जाएं। देश के युवाओं से अनुरोध ये कि वो अपने देश के मौजूदा हालात का माखौल उड़ाने की बजाए हालात को समझें और उससे निपटने के तरीक़े ईज़ाद करे। और बजाए शॉर्ट-कट ढूंढने के देश के वर्तमान-इतिहास की जानकारी हासिल करें ताकि देश और आवाम की ज़रूरतों को समझ सकें।अगर शासन की तमाम व्यवस्थाओं को एक इमारत के मानिन्द माना जाए तो राजतंत्र, तानाशाही और दूसरे सभी तरह की व्यवस्थाएं जर्जर हो चुकीं इमारत के जैसी हैं, सिर्फ लोकतंत्र ही वो व्यवस्था जिसकी इमारत नई और बुलंद है। सतही सर्वे को नतीजा मानने के बदले ज़मीनी हक़ीक़त को देखकर, अब ये देश का युवा तय करे कि उसे किस तरह की इमारत में रहना है। हां ये याद रखना ज़रूरी है कि इस दुनिया के तमाम देशों ने तमाम तरह की व्यवस्था देखने के बाद ही जनतंत्र यानी लोकतंत्र यानी डेमोक्रेसी को तहेदिल से गले लगाया है। सभी व्यवस्थाओं के बीच लोकतंत्र सबसे नया ज़रूर है लेकिन सबसे भरोसेमंद भी है, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता

2 comments:

प्रभाकर पाण्डेय said...

पूर्णरूपेण सहमत।। सारांश या कहूँ निष्कर्ष में आपने सामयिक सच्चाई को पूरी तरह से सामने रख दिया है। इस लेख हेतु सादर आभार।।

अभिषेक पाटनी said...

शुक्रिया सर