Wednesday, December 29, 2010

दिल्ली का एक अस्पताल ऐसा भी…

स्टीम बाथ—-25 रुपये,

एनिमा——25 रुपये

एक्यूप्रेशर—–10 रुपये,

योग—–10 रुपये/सप्ताह

बॉडी मसाज—50 रुपये,

स्पाइन मसाज—20 रुपये

फादर ऑफ मेडिसिन हिप्पोक्रेट्‌स ने कहा है कि एक बीमार आदमी को प्रकृति ठीक करती है न कि एक डॉक्टर. आज हालात ठीक इसके उलट हैं. आज इंसान प्रकृति से दूर हो गया है. डॉक्टरों की संख्या और दवाइयों की खोज तो बढ़ती गई, लेकिन उसी अनुपात में बीमारियां भी बढ़ती जा रही हैं. प्राकृतिक चिकित्सा इतनी सस्ती है कि इसका लाभ ग़रीब से ग़रीब आदमी भी उठा सकता है. गांधी जी का मानना था कि प्राकृतिक चिकित्सा का ज़्यादा से ज़्यादा प्रचार-प्रसार किया जाना चाहिए. गांधी जी के उसी सपने को आज दिल्ली का सेवक राम नेचुरोपैथी सेंटर पूरा कर रहा है. 1921 में लाला लाजपतराय ने लाहौर में लोक सेवा मंडल की नींव रखी थी, जिसका उद्घाटन गांधी जी ने किया था. बाद में इसे दिल्ली ले आया गया. इसी लोक सेवा मंडल परिसर में सेवक राम नेचुरोपैथी सेंटर 1983 से लोकसेवा में जुटा है. नेचुरोपैथी सेंटर को देखने के बाद यह कहना पड़ता है कि दिल्ली जैसे शहर में इससे सस्ता और कारगर इलाज कहीं और उपलब्ध नहीं हो सकता. यह सेंटर अपने आप में एक पूर्ण अस्पताल है. सेंटर के एचओडी डॉ. एस एन यादव बताते हैं कि हम यहां नो प्रॉफिट-नो लॉस के आधार पर काम करते हैं. हम यहां किसी भी थेरेपी के लिए अधिकतम 50 से 60 रुपये लेते हैं. हमारे पास बहुत सारे लोकसेवक (वालंटियर्स) हैं, जो बिना कोई पैसा लिए काम करते हैं, बीमार लोगों का इलाज करते हैं. इस सेंटर में स्टीम, बाथ, स्पाइन मसाज, मड बाथ, एनिमा एवं एक्यूप्रेशर बॉडी मसाज की सुविधा है. इस सबके लिए आपको सिर्फ 20 से 50 रुपये तक का खर्च उठाना है

सेवक राम नेचुरोपैथी सेंटर

लाजपत भवन, लाजपत नगर-4, नई दिल्ली-110024

Monday, December 27, 2010

भ्रष्टाचार भैया की जय

भ्रष्टाचार को लेकर देश में कोई कुलबुलाहट हो या न हो पर सरकार और विपक्ष में ज़रूर है. राष्ट्रमंडल खेल से लेकर टू-जी स्पेक्ट्रम तक दलाली और घोटालों को लेकर कई नए खुलासे हुए. अरब नहीं खरबों रुपये का चुना लगा. इतना हंगामा अब किया जा रहा है. संसद को विपक्ष ने चलने नहीं दिया. यह सब हंगामा बेकार ही जायेगा. सरकार जेपीसी बनाने पर राज़ी नहीं है. मेरा तो सवाल ये है कि कोई जाँच कर ले नतीजा कुछ नहीं आने वाला है. हमें यह सच कबूल लेना चहिये कि हमारा मुल्क एक भ्रष्टाचार प्रधान देश है. यहाँ कानून का पालन करने वाले को सजा और घोटाला करने वालों को इनाम मिलता है. मधु कोड़ा से लेकर ए राजा तक. जिस मुल्क के प्रधानमंत्री पर घोटाले का आरोप लगा हो (बोफोर्स) उसके बारे में इन सब मसलों पर क्या बात की जाये. आजादी के बाद से लेकर देश को विकसित बनाने तक इन सबके नाम न जाने कितने घोटाले हुए होंगे किसी को सही आंकड़ा भी पता नहीं होगा. दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं होता. अमूमन हाशिए पर वे ही धकेले जाते हैं, जहां से प्रतिरोध की आशंका कम होती है. तकरीबन तमाम देशों की सरकारें कॉरपोरेट जगत एवं ऊंचे तबके पर बैठे लोगों को नाराज करने की स्थिति में नहीं होतीं लेकिन आम जनता को ठगना आसान होता है. मसलन, भारत सरकार यहां के उद्योग जगत को लाखों करोड़ रुपये की रियायत चुटकी में दे देती है, जिसका जिक्र शायद ही कहीं होता है. टू जी स्पेक्ट्रम के मामले में भी यही हुआ. पहले तो मनमोहन सिंह ने अपनी मर्जी के खिलाफ राजा को मंत्री बनाया और अब वही राजा मनमोहन की प्रजा के लिए एक नासूर बन गए हैं. फिर भी हिम्मत की दाद तो दीजिये कि कोई ज़िम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है. भारत में एक सबसे अनूठी बात यह है कि किसी भी स्तर पर...चाहे कोई मंत्री हो या मामूली सा अर्दली अगर कोई अच्छा काम होता है तो सभी क्रेडिट लेना चाहते है. भले ही वह काम उन्होंने नहीं किया पर क्रेडिट लेने से चूकते नहीं. पर, कोई गलत काम भले ही उन्होंने ही किया पर उसकी हांडी वह दूसरो पर ही फोड़ते हैं. भारत चलता है सिंड्रोम से ग्रस्त हैं. अब राष्ट्रमंडल खेल का मामला ही ले लीजिये कितना हो हल्ला हुआ था, लेकिन जब खेल ख़त्म हुआ तो सब कुछ हल्ला भी कहीं दब के रह गया. यदि हमारे राजनीतिज्ञ और देश के उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों सहित हम स्वयं अपनी जिम्मेदारियों को समझें और उनका पालन ईमानदारी पूर्वक करे तो इस देश को महाशक्ति बनने से कोई भी नहीं रोक सकता है. लेकिन यहाँ तो मामला ही उलट है सभी को बस एक अवसर की तलाश होती है. मौका मिला नहीं कि बस सब कुछ हसोथ के रख लिए. कलमाड़ी को बलि का बकरा बनाना ठीक नहीं है. सब कुछ पीएमओ और दस जनपथ की नाक के नीचे हो रहा था. इसके पीछे कलमाड़ी जी का हाथ नहीं है और भी कई लोग इसके पीछे हैं. परदा उठना जरूरी है. और यह सच्चाई सामने आनी चाहिए. किसी भी कीमत पर, लेकिन मेरा यकीं मानिये अभी तक जितनी जाँच चल रही है सब पूरे मामले की लीपापोती करने की कवायद है. चाहे वह राष्ट्रमंडल खेल का हो या टू जी.

Saturday, December 25, 2010

मीडिया के मतलबी महायोद्धा

यह  मीडिया में अवसाद का युग है। दूसरों को सवालों से परेशान करने वाला मीडिया आजकल ख़ुद सवालों से परेशान है। बात आप सभी जानते हैं। कौन से मसले और बहस खबरें बन रही हैं, यह भी सब समझ रहे हैं। ऐसे में खुद को संभालने वाला, मीडिया को बचाने वाला कोई नजर नहीं आ रहा। सभी प्रोफेशनलिज्म का हवाला देकर अपना पल्ला छुड़ा रहे हैं। पहले बहस होती थी कि अब तो अखबारों और टीवी चैनलों को मालिक चैनल चला रहे हैं। मतलब यह कि मालिक संपादक बन गए और संपादक मालिक बन गए। तो ऐसे में मजबूर पत्रकार मजदूरी करने के सिवा कुछ नहीं कर सकता। यह रोना कई दिग्गज रो चुके हैं। पर, उन सभी घड़ियाली आंसू ही बहाए। दरअसल, जो अब तक पत्रकिरता के नाम पर कोलाहल मचाए हुए थे, उनका कच्चा-चिट्ठा सामने आ रहा है। जिनका नहीं आया है, वक्त-बेवक्त उनका कारनामा भी सामने आएगा। पर, बात ज़रा इससे अलग करूंगा। हम सभी या जो कोई भी पत्रकारिता के खत्म होने या उसके नैतिक पतन का रट्टा लगाते रहते हैं, तो मेरा सवाल यह है कि हम इसके अलावा क्या करते हैं। हमें भी मौक़ा मिलता है और चूकना हमारी फितरत है नहीं। जिन्हें अवसर नहीं मिलता, वह हाथ मलते रहते हैं और जब तक उन्हें कोई मौक़ा नहीं मिलता वह पत्रकारिता के क़ब्र तक पहुंचने का रोना लगाए और धरना-प्रदर्शन करते रहते हैं। इसमें वह भी शामिल हैं, जिनका ज़मीर कभी-कभी कब्र से जाग उठता है। और एक हुंकार भरकर फिर अपने ठिकाने की आगोश में चला जाता है।
दूसरी बात, यह कि पैसा सभी को चाहिए। सभी को अच्छी ज़िंदगी जीनी है। कोई त्याग और कुर्बानी शब्द तक का इस्तेमाल नहीं करता। करता भी है तो बस वीओ और ख़बरों में। पत्रकारिता की दुनिया में अगर लोगों को ऐशो-आराम भी चाहिए और नैतिकता भी, तो ऐसा अब होना बेहद मुश्किल है। ठीक उसी तरह जैसे ठाकुर और गब्बर को साथ-साथ रखना। यदि ठाकुर की आन-शान को रखना चाहते हैं तो जय को कुर्बानी देनी पड़ेगी। लेकिन, यहां जय भी अब आग पैदा करने के लिए गब्बर बन रहा है। तो चीजें बेहद आसानी से समझी जा सकती है। फिर भी निराशा की ज़िदगी हमें नहीं जीना है। हिंदुस्तानी तहज़ीब हमें मुसीबतों में रास्ता दिखाती है। तूफान में भी कस्ती को किनारा मिल ही जाता है। पर, यह है कि बस तूफान के थमने का इंतज़ार करिए बस। नहीं तो जो समंदर पर भी बांध बना सके वह आगे आए और भारतीय मीडिया को मझधार और भवंर से निकाले। फिलहाल न तो वासुदेव हैं जो कृष्ण को काली रात में नन्द के पास यमुना पार गोकुल छोड़ने जाए और न ही नल-नील हैं जो समुद्र पर सेतु बनाएँ। पत्रकारिता के बारे में बस एक बात और जो मेरे एक काबिल मित्र ने कभी कही थी वह यह कि वह यह पेशा पसंद करता है, क्योंकि उसे इसका काम और नेचर पसंद है। उसे खबरें लिखना पसंद है। वह इस दुनिया को पसंद करता है, क्योंकि इस दुनिया में जो कुछ भी करना पड़ता है उसे करने मेरे मित्र को मजा आता है। उसे खुशी मिलती है और एक बात यह कि वह इस दुनिया की चीजों को दूसरों से अलग करता है या कोशिश करता है। अब वह कहां तक सही है या गलत या फिर उसकी नैतिकता क्या बनती है? यह सब आप पर छोड़ता हूं। 

Tuesday, December 21, 2010

छात्रों ने की डीयू डीन को हटाने की मांग

डीयू के नए डीन सुधीश पचौरी की नियुक्ति का विरोध करते हुए छात्रों ने २१ दिसम्बर को डीयू कुलपति को एक ज्ञापन सौंपा. मांग थी की आरोपों से घिरे पचौरी को डीन पद से हटाया जाए. चाय दूकान के पास भी उक्त मेमोरेंडम की एक कॉपी भेजी गयी है. इसे हूबहू यहाँ प्रकाशित किया जा रहा है.


Memorandum

December 21, 2010

Prof. Dinesh Singh

Vice Chancellor

University of Delhi

Sub.: Demand for removal of Prof. Sudhish Pachauri, an accused in the case of sexual harassment, from the post of the Dean of Colleges.

Dear Sir

We, the members of Committee for Struggle against Sexual Harassment in the Hindi Department, would like to bring to your kind notice the following facts:

The University, being a sacrosanct point of learning and academics, should ensure equal opportunities for education to women, particularly those who come from suburban and rural areas. The University campus needs to be free from all type of anti-social activities that discourage or deter women students in their academic pursuits. Sexual harassment, when it occurs within the student-teacher relationship, is the worst form of gender domination. Legal and ethical injunctions against such gender aggression, howsoever stringent, cannot be effective in any way until the educated community like the university authorities, students and teachers adopt a stiff position against it. Attempts to overlook, underplay or outright denial will offer no solution. It will, in fact, contribute to further assertion of gender domination and sexual harassment.

As you are aware, a student from the Department of Hindi has been fighting a case of sexual harassment against three teachers Prof. Ajay Tiwari, Prof. Sudhish Pachauri and Prof. Ramesh Gautam since the year 2008. After her long struggle, the University did take a stand against Prof. Tiwari but despite being passed in the EC one and half year ago, the decision of his termination has not been implemented yet. The other two teachers mentioned in the complaint were allowed to go scot free simply on their version of the case. The victim’s repeated demands submitted in writing seeking permission to counter question their version was declined by the University. She has consequently gone to the Court regarding this matter and has informed the V. C. office about it.

The appointment of Prof. Pachauri as Dean of Colleges, in such circumstances, has given us much reason to be upset. We have serious apprehensions that Prof. Pachauri will use his power and position as Dean to adversely influence the case. He has already misused his office as Head of Department, to deny the victim admission to Ph. D. although she had topped in M. Phil. This was done to punish the victim because of her firm stand and protest. Prof. Pachauri did not stop there. He flouted the laid down procedure and norms to admit candidates in Ph. D. who had supported the accused teachers as witnesses in the case. The victim has gone to the Court against this injustice also.

We appeal to you to remove Prof. Pachauri from the office of Dean of Colleges and other responsibilities to enable a fair and unbiased examination of the ongoing cases against him. It is unimaginable and unethical for an accused to hold the high office through which the related case files must necessarily pass. We further appeal to you to remove Prof. Ramesh Gautam as well from all responsible positions like expert panel, V. C. nominee, examination etc. so that he does not influence the academic/administrative decisions in the Department/University.

Sir, we hope that you will accept our appeal to restore our faith in the democratic functioning of the University and to ensure that women students’ pleas for justice do not pass unheard.

With regards

Yours sincerely

Indu

Member

Committee for Struggle against Sexual Harassment in the Hindi Department


क्या है डीयू डीन का मामला

पढ़ने के लिए यहां क्लिक करे

Friday, December 10, 2010

डीयू, डीन और...?

''मुझे समझौता करने को कहा गया. ऐसा नहीं करने पर डीयू से निकालने की धमकी दी गयी. और ऐसा हुआ भी. मुझे निकाल दिया गया. मामले को ले कर कोर्ट में गयी.  एक संवेदनशील मामला कोर्ट में है. जिसमे आरोपी सुधीश पचौरी भी है. फिर भी कुलपति ने उन्हें डीन बना दिया. मैंने कुलपति को लिखा की जब तक मामला कोर्ट से फ़ाइनल नहीं हो जाता तब तक आरोपी को कोइ भी प्रशासनिक पद नहीं दिया जाए. मेरी यह लड़ाई  इसलिए  है ताकि शिक्षण संस्थानों में यौन उत्पीडन की घटना बंद हो. फिर किसी लड़की को रूचिका की तरह आत्म ह्त्या न करनी पड़े'' ( यह पूरी कहानी पीडिता से बातचीत के आधार पर लिखी गयी है. पीडिता के अनुरोध पर नाम नहीं दिया जा रहा है)

 मामला सितम्बर २००८ का है.  जब दिल्ली विश्वविद्धयालय के हिंदी विभाग में एमफिल कर रही छात्रा ने तत्कालीन कुलपति प्रो. दीपक पेंटल,और विश्वविद्धायालय अपेक्स कमिटी को शिकायत कीउसने हिंदी विभाग के ३ प्रोफेसरों प्रो. अजय तिवारी,प्रो. रमेश गौतमऔर तत्कालीन हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. सुधीश पचौरी पर यौन उत्पीडन का आरोप लगाया थाछात्रा ने शिकायत में बताया था की वर्ष २००७ में वह दिल्ली विश्वविद्धयालय के स्कूल ऑफ़ ओपन लर्निंग से एमए हिंदी द्वितीय वर्ष की पढाई कर रही थी. इस दौरान वहां पढ़ाने वाले हिंदी विभाग के प्रो.अजय तिवारी ने उसके साथ छेड़छाड़,शारीरिक सम्बन्ध बनाने के लिए बार बार दबाव डालना और भद्दे एसमएस भेजकर उसे परेशान किया. वह एसओएल में एमए में द्वितीय रही. एमफिल में दाखिले के लिए हिंदी विभाग में फॉर्म भरा और एमफिल का सिलेबस जानने के लिए तत्कालीन विभागाध्यक्ष प्रो. रमेश गौतम और प्रो.सुधीश पचौरी के पास गई. उन्होंने  भी प्रो.अजय तिवारी की बात मानने के लिए दबाव डाला और बात न मानने पर विश्वविद्धयालय से भगा देने की धमकी दी. जब वो  एमफिल की छात्रा बन गई तब भी तीनों ने उसे परेशान किया. जब मामला अपेक्स कमिटी पहुंचा तो अपेक्स कमिटी ने प्रो.अजय तिवारी को दोषी पाया और बाकी दोनों प्रोफेसर को दोष मुक्त कर दिया. प्रो. अजय तिवारी को निकाल दिया गयाछात्रा इस निर्णय से संतुष्ट नहीं थी. वो १ वर्ष से कुलपति से केस को फिर से शुरू करने के लिए गुहार लगा रही थी लेकिन जब उसे सफलता नहीं मिली और उसकी परेशानी बढ़ी तो अंततः उसे दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा. मामला फिलहाल हाई  कोर्ट में है. बावजूद  इसके डीयू कुलपति ने उक्त मामले के आरोपी प्रोफ़ेसर सुधीश पचौरी को डीन जैसे महत्वपूर्ण पद पर क्यों नियुक्त किया? छात्राओं की सुरक्षा वयवस्था की जिमेदारी ऐसे ही प्रोफेसोरों पर टिकी है. ऐसे व्यक्ति को इतनी महतवपूर्ण पद पर बैठाना कितना उचित है? यौन उत्पीडन का मामला शैक्षणिक संस्थानों में उच्च नैतिक मूल्यों को भी प्रभावित करता है. क्या डीयू कुलपति और मानव संसाधन मंत्रालय इस और ध्यान देंगे. एक पीडिता की आवाज सुनेंगे. 

Thursday, December 9, 2010

कमाल की खबर....सुनो...सुनो...सुनो

जल्द आ रहा है चायदुकान पर
कमाल की खबर....सुनो...सुनो...सुनों....खबर साहित्यकारों के लिए..... अकादमिक जगत से जुड़े शिक्षकों के लिए.....,खबर बुद्धिजीवियों के लिए और छात्रों के लिए भी.....खबर दिल्ली विश्वविद्धालय की..एक प्रोफेसर जो साहित्यकार भी है उनकी....शैक्षणिक संस्थानों में गिरते नैतिक मूल्यों की.......खबर एक पीडक की....पीडिता की और पीड़क को पावरफुल बनाने की......


Wednesday, December 8, 2010

उम्मीद की रोशनी


गरीब, उपर से विकलांग. जमीन के नाम पर सिर्फ उतना ही जिस पर झोपडीनुमा घर बना हुआ है. बेरोजगारी और मुफलिसी इनकी नियति थी. कल तक, कालू भाट और राधेश्याम की जिंदगी की कहानी कुछ ऐसी ही थी. लेकिन ये कल की कहानी है. आज कालू भाट और राधेश्याम की जिंदगी में रोशनी है. आंखों में चमक है. उम्मीद की किरण है. एक सपना है. बेहतर भविष्य का. और उनका यह सपना पूरा किया है मोरारका फाउंडेशन ने. इन दोनों विकलांग युवकों को सौर उर्जा से चलने वाले 25 लालटेन और एक सौर उर्जा पैनल मुहैया कराया गया है. आज घर बैठे कालू और राधेश्याम दो-तीन हजार रुपये महीने का कमा रहे है.

शेखावाटी के झुंझुनू जिले के के कटरथला गांव का रहने वाला कालू भाट अपने नौ भाई-बहन में सबसे बडा है. बचपन से ही विकलांग. अशिक्षित. जमीन के नाम पर उतना ही जिस पर एक झोपडीनुमा घर है. इसी तरह, दसवीं पास राधेश्याम बचपन में ही पोलियों के चपेट में आ कर अपने दोनों पैर गवां चुका था. पिता की पहले ही मौत हो चुकी थी. पांच बहनों और मां की जिम्मेवारी भी विकलांग राधेश्याम पर ही थी. फाउंडेशन की सौर लैंप योजना के तहत राधेश्याम को भी 25 सौर लालटेन और एक सौर उर्जा पैनल उपलब्ध कराया गया.

इससे, कालू और राधेश्याम को रोजगार तो मिला ही, कटरथला और आस-पास के गांवों के लोगों को भी अंधेरे से लडने का एक नया हथियार मिल गया. इलाके के ज्यादातर गांवों में बिजली आपूर्ति नियमित नहीं है. सो, छात्र से ले कर किसान तक कालू भाट और राधेश्याम से सौर उर्जा चालित लालटेन किराये पर ले जाते है. दुकानदार, शादी-समारोह के अवसर पर भी इन सौर लालटेन की मांग बढती जा रही है. बदले में कालू और राधेश्याम को प्रति लालटेन एक रात का 10 रुपये मिल जाता है. हां, छात्रों के लिए विशेष रियायत भी है. पढाई करने वाले छात्रों के लिए प्रति लालटेन एक रात का किराया सिर्फ 5 रुपया है. कालू भाट और राधेश्याम जैसे विकलांग युवकों के उत्साह को देख कर यह कहना गलत नहीं होगा कि कभी-कभी घुटनों के बल चलने वाले भी जंग जीत जाते है. खास कर जिंदगी की जंग.

Monday, December 6, 2010

6 दिसंबर: सांप्रदायिक कौन?



6 दिसंबर आते ही जेहन में मंदिर मस्जिद घूमने लगते हैं. बाबरी कांड आ जाता है. लेकिन आज कुछ और भी याद आ रहा है. वह ये कि सांप्रदायिक और धर्मनिरपेक्षता असल में है क्या? हमारा देश खुद को लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष मानता है और यहां बाबरी कांड हो जाता है और पाकिस्तान समेत कई मुस्लिम जिनके लिए कहा जाता है कि वहां सांप्रदायिता हावी है, वहां कई हिंदू मंदिर सदियों से खड़े है. आन-बान और शान के साथ. किसी के भी टूटने की नौबत नही आई. ऐसे में तो भइय्या भारी कन्फ्यूजन हो रहा है कि कौन धर्मनिरपेक्ष है और कौन सांप्रदायिक. वो जो मंदिर सलामत रखता है या फिर वो जो मस्जिदे तोड़ता हैं.

अयोध्या के बाबारी कांड से हम सब वाकिफ हैं. उसकी तस्वीर देख ही रहे हैं साथ ही आपको कुछ मुस्लिम देशों की तस्वीर भी दिखाते हैं. यहां कुछ हिंदू मंदिरों की तस्वीरें हैं. यह वो मंदिर हैं जो अलग अलग मुस्लिम मुल्कों में सदियों से खड़े हैं. जबकि हमें यही सुनने का मिलता है कि इन कट्टर मुल्कों में दूसरे मजहबों के लिए कोई जगह नहीं है. अब इन मंदिरों की तस्वीरों देखिए और दूसरी बाबरी विध्वंस की.

खुद ही फैसला कीजिए कि कौन धर्मनिरपेक्ष है और कौन सांप्रदायिक.

Saturday, December 4, 2010

देखिए...पीएम-राजा लेटर डिप्लोमैसी



अगर आपने वो सारे पत्र नहीं पढ़े है जो राजा ने पीएम के पत्र के जवाब में लिखे है तो यहां देख लीजिए. वो पत्र, जिसके लिए राजा को सुप्रीम कोर्ट से डांट पडी. एक पत्र पीएम का है. बाकी राजा के.सबसे उपर का पत्र . बिंदु संख्या 3 . थोडा पढिए, ज्यादा समझिए.

कुछ दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने राजा की क्लास लगाई. यह कह कर कि राजा ने 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन के पहले अटार्नी जनरल का मत जानने की विधि मंलय की सलाह को संदर्भहीन माना. साथ ही, कोर्ट ने राजा को इस बात के लिए भी डांट पिलाई कि वे प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में आर्बिट्ररी(मनमाने ढंग से), डिस्क्रिमिनेशन(भेदभाव), यू लुक योअर एटिट्यूड(अपना नजरिया देखिए) जैसे शब्दों का इस्तेमाल कैसे कर सकते हैं.

Thursday, December 2, 2010

भोपाल.26 साल.इन्होनें भी दिए जख्म


दिसंबर 1984 की काली रात. हजारों बेगुनाहों को मिक गैस ने अपना शिकार बनाया. आज 26 साल पूरे हो गए इस घटना को. लेकिन आज बात एंडरसन की नहीं. अपने लोगों की. उन जख्मों की जो भोपाल पीडितों को अपनों ने दिए. मुकेश अंबानी से ले कर रतन टाटा, पृथ्वीराज चौहान, चिदंबरम, कमलनाथ, रोनेन सेन, जयराम रमेश तक. लंबी फेहरिश्त. बात इनके लिखे पत्रों की. जिसके एक-एक शब्द डाओ के समर्थन और भोपाल पीडितों के खिलाफ हैं. आरटीआई के जरिए निकाले गए ये सारे पत्र इन महानुभावों की पोल खोल रही हैं.

पृथ्वी राज चौहान

भोपाल गैस पीडित पीएमओ में ईमेल भेज कर प्रधानमंत्री से मुलाकात का वक्त मांगा. 14 मार्च 2006 को पीएमओ में राज्य मंत्री पृथ्वी राज चौहान एक पत्र लिख इस मामले पर अपनी राय देते है. वो लिखते है कि मैं इनमें से कुछ लोगों से मिल चुका हूं. मुझे नहीं लगता कि इस वक्त प्रधानमंत्री को इन लोगों से मिलना चाहिए.

रोनेन सेन

30 सितंबर 2005. अमेरिका से भारतीय राजदूत सेन पीएम के प्रधान सचिव को पत्र लिखते है. बताते है कि उनकी मुलाकात डाओ के सीईओ एंड्रयू लिवेरिस मेरे पास एक प्रस्ताव ले कर आए. इसके मुताबिक, डाओ भारत के पेट्रोकेमिकल्स क्षेत्र में भारी निवेश करना चाहता है. साथ ही डाओ के खिलाफ कानूनी पचडे हटाने की भी बात है. सेन लिखते है कि मैं सोचता हूं कि यह एक उत्कृष्ट प्रस्ताव है. इससे भारत में एफडीआई को बढावा मिलेगा. आप संबंधित मंत्रालय के अलावा रतन टाटा और मुकेश अंबानी के विचार भी इस मसले पर ले सकते है. तब एंड्रयू लिवेरिस इंडिया-यूएस सीईओ फोरम के सदस्य थे.

रतन टाटा

2006. प्रधानमंत्री और चिदंबरम को पत्र भेजते है. लिखते है कि भोपाल गैस कांड से प्रभावित स्थल के साफ-सफाई के लिए 100 करोड रूपयें का एक फंड या ट्रस्ट टाटा कंपनी और अन्य भारतीय उद्‌ध्योगपती मिल-जुल कर तैयार कर सकते है. टाटा का तर्क, डाओ केमिकल्स एक बहुत बडी कंपनी है और वह भारत में बहुत बडे पैमाने पर निवेश करना चाहती है इसलिए डाओ को 100 करोड रूपये जमा कराने की जवाबदेयता से मुक्त किया जाए. गौरतलब है कि तब रतन टाटा इंडो-यूएस सीईओ फोरम के को चेयर मैन भी थे.

पी. चिदंबरम

दिसंबर 2006. प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर बताते है कि हमलोगों को रतन टाटा का वह प्रस्ताव स्वीकार कर लेना चाहिए जिसमें उन्होनें 100 करोड रूप्पये का एक फंड बनाने की बात कही है और साइट रेमेडिएशन ट्रस्ट रतन टाटा की अध्यक्षता में गठित करना चाहिए.

कमलनाथ

फरवरी 2007. वाणिज्य मंत्री पीएम को लिखते है. डाओं भारत में एक बडा निवेश कर रहा है इसलिए मैं आग्रह करना चाहूंगा कि कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में एक समूह का गठन किया जाए जो इस मामले को समग्र रूप से वैसे ही देखे जैसे एनरॅान और डाभोल पावर कॅार्पोरेशन के मामले को देखा गया था.

मुकेश अंबानी

अंबानी और डाओ के बीच पेट्रोकेमिकल क्षेत्र में तकनीकी सहयोग से जुडा एक समझौता भी हो चुका है. लेकिन 100 करोड रुपयें का मामला डाओ की भारत यात्रा में रूकावट बनी हुई है. सवाल उठता है कि यह सब कुछ जानते हुए भी अंबानी को डाओ से व्यापारिक समझौता करने की ऐसी जल्दी क्या थी?

जयराम रमेश

पर्यावरण मंत्री भोपाल यात्रा के दौरान यूनियन कारबाईड के परिसर पहुंचे, वहां फैले कचरे को अपने हाथ से छू कर मीडिया को दिखाया. शायद वह संदेश दे रहे थे कि भोपाल के लोग झूठ बोलते है कि यहां का कचरा जहरीला है. मैने तो छू लिया, मुझे तो कुछ नहीं हुआ.

Wednesday, December 1, 2010

एड्‌स का पश्चिमी हौव्वा



विदेशी कंपनियां...डव्ल्यूएचओ...पैसा..रिचर्ड गेरे, टॉम हैंक्स से लेकर नेल्शन मंडेला जैसी हस्तियां इस फोटो में...भारत में सिवाए पोलियो के शायद ही किसी बड़ी बीमारी से कोई बड़ा सितारा जुड़ा हो

अमेरिका और पश्चिमी देशों के लिए एक कहावत है कि व्हेन इट्‌स कम्स टू वॉर अमेरिका मींस बिजनेस. मतलब दुनिया में कही भी कोई समस्या हो, महामारी हो या युद्ध हो, पश्चिमी देशों के लिए मुनाफे के बड़े अवसर लेकर आता है. ऐसे ही एक बड़े अवसर के तौर पर एड्‌स महामारी को पश्चिमी देश धनोपार्जन के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं.

आप बताइए... क्या दुनिया में एड्‌स से बड़ी कोई बीमारी नहीं है. दुनिया को छोड़िए, एशिया और भारत को लीजिए. देश में कुपोषण से लाखों-करोड़ों बच्चे मर रहे हैं, हैपेटाइटस बी, कैंसर, कुष्ठ रोग और दूर दराज में न जाने कितनी ऐसी बीमारिया हैं जिनका अभी तक नाम भी नहीं रखा गयस है. रहस्यमय तरीके से लोग मरते जा रहे हैं लेकिन जितना महिमामंडन एड्‌स का किया गया है और जितने बड़े बड़े कैंपेन इस बीमारी को लेकर चलाए गए हैं, उससे तो यही लगता है कि इससे बड़ी बीमारी दुनिया में है ही नहीं.

दरअसल यह पश्चिमी देशों कर बनाया हुआ हौव्वा है. जितनी पब्लिसिटी इस बीमारी को मिली, उतना ही फायदा उन सभी विदेशी कंपनियों को हुआ जो कंडोम से लेकर कई फर्जी दवाएं बनाती है. इसके अलावा एड कैंपेन के नाम पर भी विदेशी कंपनियां डव्ल्यूएचओ से मनचाहा पैसा वूसलती हैं. अंतरराष्ट्रीय हस्तियां भी इस कैंपेन से जुड़ती रहती हैं. रिचर्ड गेरे, टॉम हैंक्स से लेकर नेल्शन मंडेला जैसी हस्तियां इस फोटो में आपको दिखाई दे जाएंगी. ये वो हस्तियां हैं जिन्हें पूरी दुनिया में सुर्खियां मिलती है. जबकि भारत में सिवाए पोलियो के शायद ही किसी बड़ी बीमारी से कोई बड़ा सितारा जुड़ा हो. क्या इन बीमारियों से मरने वाले इन्हें दिखाई नहीं देते. या फिर इन बीमारियों से इन्हें कोई खासा मुनाफा नहीं दिखाई दे रहा है. अगर ये सभी हस्तियां चाहे तो न जाने कितनी बीमारियों के लिए दुनिया भर में जागरूकता अभियान चलाकर लोगों का भला कर सकते हैं लेकिन शायद इनको भी समाजसेवा के नाम पर सिर्फ सुर्खिया ही बटोरनी हैं.

एड्‌स वाकई इतनी घातक बीमारी है या फिर इससे भी बड़ी कई और बीमारियां हैं, इस पर चाय दुकान के सभी पाठकों की राय का स्वागत है.

हमको लिख्यो है कहा ...


(भारत-ओबामा संबंध की पड़ताल कर रहे हैं दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉक्टर प्रेम सिंह. डॉक्ट सिंह समाजवादी जन परिषद से जुडे है और सामाजिक मुद्दों पर उनकी बेलाग टिप्पणी विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं औरअखबारों में छपती रहती है. चाय दुकान पर इस लेख को प्रकाशित करने की अनुमति देनेके लिए प्रेम सर को बहुत-बहुत धन्यवाद. चाय दुकान पर उनके विचार से हम लगातार अवगत होते रहेंगे.)

जगन्नाथदास रत्नाकर की रचना उद्धव शतक में उद्धव कृष्ण की पाती लेकर गोकुल में आते हैं तो कृष्ण के विरह में तड़पती गोपियों उन्हें घेर लेती हैं। सभी एक साथ जानना चाहती हैं कि उद्धव उनके लिए मथुरा से क्या संदेश लेकर आए हैं। गोपियों की उत्कंठा की एक बानगी देखिए. उझकि उझकि पद कंजन के पंजन पै, पेखि पेखि पाती छाती छोहन छबै लगी। हमको लिख्यो है कहा हमको लिख्यो है कहा, हमको लिख्यो है कहा कहन सबै लगी। एशिया के दौरे पर निकले ओबामा के पहले भारत आने के समाचार से शासक वर्ग उद्धव की गोपियों से भी ज्यादा बेहाल हो उठा। आखिर, दूत नहीं, साक्षात कृष्ण चले आए! चारों तरफ ओबामा-ओबामा की पुकार मच गई। सभी पूछने लगे, ओबामा की झोली में हमारे लिए क्या है, हमारे लिए क्या है?

जनता की नजर से यह सच्चाई छिपा ली गई कि ओबामा झोली भरने आए हैं। यह सच्चाई केवल इसलिए नहीं छिपाई गई कि ओबामा जो झोली भर कर जाएंगे उसमें से यहां के शासक वर्ग को हिस्सा-पत्ती लेना है, बल्कि इसलिए भी कि जनता को यह न पता चल जाए कि अपने देश के नागरिकों को मंदी और बेरोजगारी से उबारने के लिए वहां का राष्ट्रपति किस कदर दुनिया में भागा घूम रहा है। अगर उसने नागरिकों की समस्याएं दूर नहीं की तो सत्ता से उसका पत्ता साफ हो जाएगा।

पुराने जमानों में किसी चक्रवर्ती राजा की ऐसी धक और ध्वज नहीं होती होगी जैसी अमेरिका के राष्ट्रपति की होती है। ओबामा की कुछ ज्यादा ही रही। अमेरिका में उनकी यात्राा पर खर्च को लेकर विवाद उठ गया। यह आरोप लगा कि ओबामा की यात्रा पर 200 मिलियन डॉलर का भारी-भरकम खर्च किया गया है। व्हाइट हाउस ने इस आंकड़े को अशियोक्तिपूर्ण बताया। जो भी हो, दुनिया का धन-संसाधन खींचना है और रौब-दाब कायम रखना है तो काफिला भारी-भरकम और शानो-शौकत वाला होना चाहिए। ओबामा की खूबी यह रही कि इस सबके साथ गांधी-प्रशंसा का राग भी निभा ले गए।

भारत का शासक वर्ग ओबामा के प्रति संपूर्ण समर्पित हो गया। जो मंत्राी-मुख्यमंत्राी नागरिक जीवन में शासन का आतंक फैलाते हुए नागरिक जीवन को रौंदते चले जाते हैं, उन्हें समर्पण से पूर्व ओबामा के अमलों को अपना पहचान-पत्रा दिखाना पड़ा। कमी बस पाकिस्तान को खरी-खोटी नहीं सुनाने की महसूस की गई। वह ओबामा ने सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट दिए जाने की वकालत करके पूरी कर दी। सारा शासक वर्ग जैसे नशे में झूमने लगा। हालांकि विकीलीक्स के खुलासे से पता चला कि अमेरिका की विदेश सचिव हिलेरी क्लिटंन कहती हैं कि भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट पाने का स्वनियुक्त दाावेदार है। बहरहाल, इस बार सांसदों ने ओबामा से हाथ मिलाने के लिए बिल क्लिटंन के वक्त जैसी आपा-धापी नहीं मचाई। इसमें शायद रंग का कुछ भेद रहा हो!

पूरे सत्ता प्रतिष्ठान ने एकमुश्त एक संदेश दिया : जो करेगा अमेरिका करेगा। और अमेरिका सब भला करेगा। अमेरिका हमेशा भला करता है। किसी को अमेरिका का किया कहीं कुछ बुरा लगता है तो उसे जानना चाहिए कि वह बुरा भले के लिए ही होता है। भारत का भला न जाने कब का हो जाता, अगर वह रूस के चक्कर में नहीं पड़ता। कोई बात नहीं। अमेरिका बड़ा कृपानिधान है। देर से आने का बुरा नहीं मानता। परिस्थितियां पूरी तरह पक चुकी हैं। भला भी पूरा होगा।

इस परिदृश्य का समाजशास्त्रीय विवेचन करें तो कह सकते हैं कि शासक वर्ग में जो अगड़ा सवर्ण है वह पूरा गुलाम बन चुका है और शूद्र पूरा पिछलग्गू। दलित दोनों को पीछे छोड़ने की दौड़ लगा रहा है। ऐसे माहौल में नवउदारवादी संपादक-पत्राकार, बुद्धिजीवी, कलाकार,खिलाड़ी कोई पीछे नहीं रहना चाहते। अमेरिका का नाम आते ही नवउदारवादी पत्राकार पूरे रंग में आ जाते हैं। यहां तो साक्षात अमेरिका आया हुआ था। इंडियन एक्सप्रैस ने ओबामा के गांधी-प्रेम को सबसे ज्यादा विज्ञापित किया। ऐसा नहीं है कि अखबार की टीम को गांधी से कोई प्रेम है। उसके एक लेखक भानुप्रताप मेहता दो साल पहले तीस जनवरी के अंक में लिख चुके हैं कि गांधी चुक चुका था, लिहाजा उनकी हत्या नहीं होती तो छिछालेदर होती। अखबार में ओबामा के गांधी-प्रेम का विज्ञापन समाजवाद की निंदा के लिए किया गया। अखबार का संपादक, जो एक ब्रोकर भी है, मुखपृष्ठ पर निकल आता है और बताता है, अमेरिका के साथ बराबर का सौदा हुआ है। गुलाम दिमाग बराबर हो जाता है! जो सौदे और दावतें हुईं, कोई कह सकता है यह उसी गांधी का देश है, ओबामा ने जिनके गुणगान की झड़ी लगाए रखी?हमें स्कूल के बच्चों के साथ ओबामा का वह वार्तालाप याद आ रहा था जिसमें ओबामा ने गांधी के साथ खाना खाने की इच्छा व्यक्त की थी। का चुनाव बताने के बाद उन्होंने बच्चों से हंस कर कहा, भोजन सचमुच में थोड़ा-सा होगा, वे ढेर सारा नहीं खाते थे। कोई कह सकता है इस देश के संविधन की प्रस्तावना में समाजवादी शब्द लिखा हुआ है और सरकारों के लिए कुछ नीति-निर्देशक तत्व हैं? सौदों, दावतों और मौजमस्ती को देख कर कोई कह सकता है इस देश की अस्सी प्रतिशत गरीब जनता बीस रुपया रोज पर गुजारा करती है? लोकतंत्रा का गुणगान और उस पर विमर्श करने वाले नहीं पूछते तो गरीब क्या पूछ पाएगा कि यह कौन-सी नीति है और कैसा लोकतंत्र ? लेकिन वे तो ज्यादातर विमर्श-विनोद में मगन हैं