Tuesday, November 2, 2010

विज्ञापन खेल में नंबर वन नीतीश


हिटलशाही के दौर में एक कहावत बहुत मशहूर हुई थी. एक झूठ को सौ बार बोलो, वो सच हो जाएगा. और बकायदा झूठ को प्रचारित करने के लिए हिटलर ने एक मंत्री की भी नियुक्ति की थी. ताजा उदाहरण बिहार सरकार है. विकास और सुशासन की छवि, जो यहां बनी नहीं बनाई गई है, उसमें भी इसी फॅर्मूले का इस्तेमाल किया गया है. यानि, जितना विकास हुआ नहीं उससे कहीं ज्यादा इसके बारे में लोगों को बताया जा रहा है. और, बार-बार बताया जा रहा है. जाहिर है, इसके लिए मीडिया का सहारा लिया गया और जम कर विज्ञापन बांटे गए. सूबे के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के चार साल के कार्यकाल में करीब 65 करोड रूपये से भी ज्यादा के विज्ञापन विभिन्न अखबारों और न्यूज चैनलों को बांटे गए. जाहिर है, बुलबुल भी वैसी ही नाचेगी जैसे पैसा देने वाला चाहता है. हुआ भी ऐसा ही. करोडों का विज्ञापन लेने के बाद मीडिया ने भी बिहार की ऐसी छवि बनाई मानो सचमुच बिहार अब भूखमुक्त, भयमुक्त, भ्रष्टाचरमुक्त हो गया है.

दरअसल, नीतीश सरकार ने मीडिया की कमजोरी को पहचान लिया है. और, यह कमजोरी है, विज्ञापन की. अफरोज आलम ने बिहार सरकार के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग से आरटीआई के तहत राज्य सरकार द्वारा जारी की गई विज्ञापन के बारे में सूचनाएं मांगी थी. प्राप्त सूचना से पता चलता है कि सरकार का काम पर कम, विज्ञापन करने पर ज़्यादा ध्यान रहा है. सूचना एवं जनसंपर्क विभाग की ओर से साल 2005 से 2010 के बीच(नीतीश कुमार के कार्यकाल के चार सालों में) लगभग 64.48 करोड़ रुपये खर्च कर दिए गए. जबकि लालू-राबड़ी सरकार के कार्यकाल के अंतिम 6 सालों में महज 23.90 करोड़ ही खर्च हुए थे. मिली सूचना के मुताबिक सूचना एवं जन-सम्पर्क विभाग ने साल 2009-10 में (28 फरवरी 2010 तक) 19,66,11,694 (लगभग 20 करोड) रूपये का विज्ञापन जारी किया है, जिसमें से 18,28,22,183 (लगभग 18 करोड से ज्यादा) रूपये का विज्ञापन प्रिन्ट मीडिया को और 1,37,89,511(लगभग डेढ करोड) रूपये का विज्ञापन इलेक्ट्रॅानिक मीडिया को दिया गया. इतना ही नहीं,नीतीश सरकार के चार वर्ष पूरे होने पर एक ही दिन 1,15,44,045(लगभग 1 करोड से ज्यादा) रूपये का विज्ञापन एक साथ 24 समाचार पत्रों को जारी किया गया. इसमें भी सबसे ज्यादा एक खास समूह के अखबार को दिया गया. कुछ खास अखबारों को तो अकेले 50 लाख रूपये से ज्यादा का विज्ञापन दिया गया है.

अब ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि बिहार की असली तस्वीर और विकास की कमजोर चारदीवारी के पीछे का सच दिखा पाना ऐसे अखबारों के लिए कितना मुश्किल है. क्योंकि जब आप सच दिखाएंगे या छापेंगे तो विज्ञापन कैसे मिलेगा?

3 comments:

Shashank Singh said...

Mr.Chay, aapko janana chahiye ki jab lallo ne kam hi nahi kiya tha to ve vigyapan kya bhrastachar ki dete, chori ki dete, apradh sambandhi dete. mai aapse janana chahta hun ki lallo ne jo vigyapan diye the vo kis vikas sambandhi diye the. ye 100% sach hoga ki unke vigyapan me sach nam ka chij nahi hi hoga. kam yadi jyada hua to vigyapan jyada gaya, is bat ko lekar koi bahu badi issue nahi banani chahiye.
Nitish ne vikas kiya ise duniya kisi na kisi report ke madhyam se jan rahi hai ki kewal media walon ke kah dene se nahi.
sach kabhi pichhe nahi hota hai MR. Chay.
yun hi chuski lekar kisi ka charitra vivechan nahi kar dena chahiye. mai manta hun ki aap jaise lekhak ka hona bahut hi jaroori hai jaise ki ek satta party ke liye vipakshi. aap ke in lekhon ko mai aage badhane ka prayas karunga. jisase nitish sarkar ko maloom ho ki ve kitna galat kar rahe hai aur kitna vikas ki baten kar rahe hai.
Aap ese lekhan ko jari rakhen aap ke is lekhan me bahoot sari batein achhi lagi. I like Yr Writing. Thanx.

shashi shekhar said...

शशांक भाई,
सबसे पहले आपका धन्यवाद. आपने चायदूकान पर अपना समय दिया. आपकी बात सौ फीसदी सही है. लेकिन लोकतंत्र में सत्ता का निरंकुश हो जाना आम बात है. इंदिरा से ले कर लालू तक का उदाहरण सामने है. विकास करना सरकार का काम है. यह हम पर उपकार नहीं है. इस बात से कोई भी इनकार नहीं कर सकता की नीतीश सरकार ने काम नहीं किया है. लेकिन सवाल पूछना, जवाब माँगना और उस पर चर्चा करना भी गलत तो नहीं माना जा सकता.
उम्मीद करता हूँ, आपकी राय हमें मिलाती रहेगी.

शशि शेखर

sudhir said...

Shekhar jee main aap ke vichar se sahmat hun.Aaj main pahle bar aap ki chay dukan par aaya lagta hai aab to roj aana hoga.Shekhar bhai mera khata khol dejiye. Thank you.All the best.