Friday, December 10, 2010

डीयू, डीन और...?

''मुझे समझौता करने को कहा गया. ऐसा नहीं करने पर डीयू से निकालने की धमकी दी गयी. और ऐसा हुआ भी. मुझे निकाल दिया गया. मामले को ले कर कोर्ट में गयी.  एक संवेदनशील मामला कोर्ट में है. जिसमे आरोपी सुधीश पचौरी भी है. फिर भी कुलपति ने उन्हें डीन बना दिया. मैंने कुलपति को लिखा की जब तक मामला कोर्ट से फ़ाइनल नहीं हो जाता तब तक आरोपी को कोइ भी प्रशासनिक पद नहीं दिया जाए. मेरी यह लड़ाई  इसलिए  है ताकि शिक्षण संस्थानों में यौन उत्पीडन की घटना बंद हो. फिर किसी लड़की को रूचिका की तरह आत्म ह्त्या न करनी पड़े'' ( यह पूरी कहानी पीडिता से बातचीत के आधार पर लिखी गयी है. पीडिता के अनुरोध पर नाम नहीं दिया जा रहा है)

 मामला सितम्बर २००८ का है.  जब दिल्ली विश्वविद्धयालय के हिंदी विभाग में एमफिल कर रही छात्रा ने तत्कालीन कुलपति प्रो. दीपक पेंटल,और विश्वविद्धायालय अपेक्स कमिटी को शिकायत कीउसने हिंदी विभाग के ३ प्रोफेसरों प्रो. अजय तिवारी,प्रो. रमेश गौतमऔर तत्कालीन हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. सुधीश पचौरी पर यौन उत्पीडन का आरोप लगाया थाछात्रा ने शिकायत में बताया था की वर्ष २००७ में वह दिल्ली विश्वविद्धयालय के स्कूल ऑफ़ ओपन लर्निंग से एमए हिंदी द्वितीय वर्ष की पढाई कर रही थी. इस दौरान वहां पढ़ाने वाले हिंदी विभाग के प्रो.अजय तिवारी ने उसके साथ छेड़छाड़,शारीरिक सम्बन्ध बनाने के लिए बार बार दबाव डालना और भद्दे एसमएस भेजकर उसे परेशान किया. वह एसओएल में एमए में द्वितीय रही. एमफिल में दाखिले के लिए हिंदी विभाग में फॉर्म भरा और एमफिल का सिलेबस जानने के लिए तत्कालीन विभागाध्यक्ष प्रो. रमेश गौतम और प्रो.सुधीश पचौरी के पास गई. उन्होंने  भी प्रो.अजय तिवारी की बात मानने के लिए दबाव डाला और बात न मानने पर विश्वविद्धयालय से भगा देने की धमकी दी. जब वो  एमफिल की छात्रा बन गई तब भी तीनों ने उसे परेशान किया. जब मामला अपेक्स कमिटी पहुंचा तो अपेक्स कमिटी ने प्रो.अजय तिवारी को दोषी पाया और बाकी दोनों प्रोफेसर को दोष मुक्त कर दिया. प्रो. अजय तिवारी को निकाल दिया गयाछात्रा इस निर्णय से संतुष्ट नहीं थी. वो १ वर्ष से कुलपति से केस को फिर से शुरू करने के लिए गुहार लगा रही थी लेकिन जब उसे सफलता नहीं मिली और उसकी परेशानी बढ़ी तो अंततः उसे दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा. मामला फिलहाल हाई  कोर्ट में है. बावजूद  इसके डीयू कुलपति ने उक्त मामले के आरोपी प्रोफ़ेसर सुधीश पचौरी को डीन जैसे महत्वपूर्ण पद पर क्यों नियुक्त किया? छात्राओं की सुरक्षा वयवस्था की जिमेदारी ऐसे ही प्रोफेसोरों पर टिकी है. ऐसे व्यक्ति को इतनी महतवपूर्ण पद पर बैठाना कितना उचित है? यौन उत्पीडन का मामला शैक्षणिक संस्थानों में उच्च नैतिक मूल्यों को भी प्रभावित करता है. क्या डीयू कुलपति और मानव संसाधन मंत्रालय इस और ध्यान देंगे. एक पीडिता की आवाज सुनेंगे. 

13 comments:

Anonymous said...

इस मसले पर चस्का लेने के बजाय सही तथ्यों और विवरणों के आधार पर चिंतन कीजिये जनाब ...

shashi shekhar said...

सही तथ्य और विवरण के आधार पर ही यह बात लिखी गयी है. यह कहानी खुदा पीडिता की ज़ुबानी है. सबूत यह की खुद डीयू प्रशासन ने प्रो. अजय तिवारी को दोषी माना. उन्हें टर्मिनेट किया. फ़िलहाल तथ्य और विवरण के साथ पीडिता हाई कोर्ट पहुच चुकी है. सच और झूठ का फैसला नहीं है यह कहानी. बस शैक्षणिक संस्थानों में नैतिक मूल्यों के पतन की एक झलक दिखाने की कोशिश की गयी है.

Anonymous said...

bhai log aise prof ko fansi di jaani chaahiye. aise bhi aaj ke samay me delhi hi nahi pure desh me mahilaon ke sath atyachar badhta jaa raha hai khud delhi me utha kar dekh le kitane mahilaon ke saath chher chaar aur balatkaar jaisi ghatnaaye huye hai.is pure case par yadi HRD minister aur DU vice chancelor maun hai matalab o bhi yaun utpirako ke sanrakshak hai.vishvavidyalay sansthaye shiksha ka mandir hai jahan chhatro ko jina sikhaya jata hai,jahan mahila shahsaktikaran ki baat ki jaati hai,jahan sarkar aur bajar ke nitiyon ki samiksha karna sikhaya jata hai.aise sansthan me yaun utpiran ki ghatana vishvavidyalay ke saakh par prashan chinh khara karta hai.is mamale ke me pachauri aur tiwari kaa sath dene wale utane hi doshi hai jitana kapil sibbal aur prof dinesh singh.larki ki bahaduri ka jawab nahi hai usake sath lagbhag 2 salo se lagatar manshik shoshan ho raha hai phir bhi o tiki hue hai.ajay tiwari aur pachauri kaa sath dene wale vaampanthi sathi kahenge ki larki ne unka bahut shoshan kiya aur o usaka career kharab karane ki har sambhav koshish karenge.vaampanthiyon ke liye larki ke saath huye kukrit jayada mahatav ke nahi honge kyunki o ek priy saathi ko bachaane aur apni laaj chhupaane ya apne kukarm ko chhupaane ki koshish karane me inlogo ka samarthan kar rahe hai.larki ko is bahaduri ke liye meri badhai

Vishal said...

छात्रा की हिम्मत और ब्लॉगर को इस अभियान को चलाने के लिए धन्यवाद | छात्रा के साथ आम लोगो और लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ पत्रकारिता या पत्रकारिता के लोगो द्वारा सहयोग मिलाना चाहिए | बल्कि इस अभियान में छात्राओं को खुलकर विरोध करना चाहिए | जिस तरह का समाज बनता जा रहा है उसमे महिलाओं की सवतंत्रता दिन पर दिन बाधित हो रही है | प्रो. पचौरी को डीन बनाया जाना और प्रो.विभूति नारायण राय को सिर्फ माफ़ी मांगकर छोर देना महिलाओं के लिए इससे बड़ी अपमान की बात क्या हो सकती है | कपिल सिब्बल शिक्षा वयवस्था को मजबूत बनाने की बात बहुत जोड़ो से कर रहे है और उसके लिए केंद्र सरकार उन्हें इनाम पे इनाम दे रही है | क्या महिलाओं के साथ हो रहे अत्याचार और अत्याचारियों को दिया जाने वाला इनाम शिक्षा वयवस्था के मजबूत होने का सबूत है | प्रोफ. विभूति नारायण द्वारा महिलाओं के ऊपर इतनी अपमान जनक टिप्पणी करने के बावजूद उन्हें सिर्फ माफ़ी मांगकर छोर दिया जाना और प्रोफ. सुधीश पचौरी पर दिल्ली हाई कोर्ट में यौन उत्पीडन का केस होने के बावजूद दिल्ली विश्वविद्ध्यालय का डीन बनाया जाना क्या साबित करता है |शिक्षा के मंदिर में इस तरह के कार्य छात्राओं को हतोत्साहित करती है |एक छात्रा २ सालों से उतिपरण का केस लड़ रही है इसके साथ विश्वविद्ध्यालय के सभी छात्र,छात्रों और शिक्षको को आगे आना चाहिए | यह लड़ाई नैतिकता बनाम अनैतिकता की है अनैतिक लोगो को सज्जा तो मिलनी ही चाहिए इनाम नहीं | प्रोफ अजय तिवारी को निकालने के आदेश २ साल पहले दिया गया और अभी तक सिर्फ सस्पेंसन के आधार पर छोड़ा गया है इसका क्या मतलब है | अब भी यदि हम नहीं समझ रहें है तो हमसे बेवकूफ कोई नहीं हो सकता| खैर फैसला आपके हाथ में है की एक लड़की को और उत्पीडित होने के लिए छोड़ते है या अन्याय के विरूद्ध खड़ा हो उसका साथ देते है |

Anonymous said...

चाय की दूकान और सवाल इतना मजबूत की पढ़कर दुःख और आक्रोश दोनों आता है | उत्पीडन एक राजनीतिक शब्द बन गया है और राजनीति में सब जायज है विरोध के स्वर कुचले जा चुके है विरोध की राजनीति मध्य वर्ग के घटिया सोच ने खत्म कर दिया है और राजनीति और बाजार मिलकर मध्य वर्ग को गुलाम बना लिया है | विरोध के जो भी स्वर बचे है ओ मुखवटे भर है स्वार्थ सीधी के | यदि एक शिक्षक अपने धर्म का पालन इस घटीय करतूत से करता है तो ओ शिक्षक शिक्षा के अनुशाषण का ही उलंघन नहीं करता बल्कि वो अपनी नैतिकता का भी उलंघन करता है और अनैतिक होने का सबूत देता है | ऐसे भी राजनीति में कुछ भी नैतिक और अनैतिक नहीं रहा | ऐसे शिक्षक के खिलाफ आन्दोलन होना चाहिए और उसे विश्वविद्धायल से निकला जाना चाहिए | छात्र और छात्रा को यदि अनैतिक शिक्षा ही देनी है तो ऐसे शिक्षको का होना जरुरी है | और कपिल सिबल की शिक्षा की अवधारण इसी से स्पस्ट होती है | प्रो.दिनेश सिंह के वीसी बनाने के बाद संभावना बनी थी की विश्वविद्धायालय से अनैतिक लोगो का खत्म होंगे पर ए भी बाजार और राजनीति के ही खिलौने है इनके कोई विचार है ही नहीं ए तो बाजार और सरकार के चाकली करने वाले नौकर है | इनसे उम्मीद ही नहीं की जा सकती है इसलिए न्याय की लड़ाई को छात्रा द्वारा कोर्ट में ले जाना जायज है | इस लड़ाई में सबको सहयोग देनी चाहिए | समस्या ए है की आज समाज के लोग सोचते है की हमपे आएगी तो देखेंगे लेकिन उस समय तक आपका सहयोग करने वाला कोई नहीं बचेगा इसलिए सभी लोगो से अपील की जानी चाहिए की ओ इस लड़ाई को अपना समझकर सहयोग करे

Anonymous said...

इस मसले पर सिर्फ़ भावात्मक प्रतिक्रियाएं पढ़ने को मिल रही है. सत्य और तथ्य का निर्धारण कुछ बोल देने से नहीं होता है. शशि जी, आपने लिखा -'डीयू प्रशासन ने प्रो. अजय तिवारी को दोषी माना. उन्हें टर्मिनेट किया.' यह भी झूठ है. डीयू ने सस्पेंड करके ये पूछा कि क्यों ना टर्मिनेट कर दिया जाए. जो अभी तक नहीं कर पाए.
इसके लिए कारण सिर्फ़ 'शैक्षणिक संस्थानों में नैतिक मूल्यों का पतन' ही नहीं हो सकता, कुछ दूसरे कारण भी हो सकते हैं, मसलन सत्य के प्रमाण का अभाव, किसी अध्यापक के विरुद्ध षडयंत्र या साज़िश का समीकरण इत्यादि...
एक झटके में प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्था के मूल्य पतन की दुहाई बकना भी ठीक नहीं है.

Anonymous said...

भाई जान अब मामला कोर्ट में है नैतिक मूल्यों की दुहाई की बात नहीं है जब अपेक्स कमिटी ने प्रो.अजय तिवारी को दोषी मन तभी तो उन्हें टर्मिनेट किया गया भाई साहब जब किसी को टर्मिनेट किया जाता है तो पहले उससे पूछा जाता है की आपको क्यूँ न टर्मिनेट किया जाये| विश्वविद्धायालय संस्थान ने उन्हें टर्मिनेट किया है लेकिन आज तक इस फैसले पर अमन नहीं हुआ है | इसी के विरूद्ध छात्रा को कोर्ट से गुहार लगानी पड़ी है | जब दोषी नहीं थे तो उन्हें सस्पेंड करने की क्या जरुरत थी | भाई साहेब आप इन्तेजार कीजिये फैसला जल्द ही आएगा |

Goda Prabhakar said...

ye sab aaj se nahi ho raha, ye bahut saalon se hota aaraha hai, kabhi koi awaaz nahi utha ta hai.......lekin is ladki ne jo himmat dikhai hai uski daad deni padegi, aur court se umeed hai ki koi aisa kadam uthaye ki, future mai koi bhi aisa karne se pehle 100 bar soche....

चन्दन कुमार said...

mamla sangeen hai...darasal safed chadaron kee aad men kai kalee parten dafan hain...un tak pahuchna khatarnak hi nahin kafi mushkil hai...lekin jab ye baten samne aaye to hame ekjut hokar muhim men shamil hona padega

Rajesh Mehta said...

Padh kar dukh hua. DU mein kya kya hota hai, ye to Du ke sare vidyarthi jante hain lekin awaaz uthane se darte hain. Homosexuality ka mamla ho, ya ghotale ka-sab chup hai aur safe bhi hain. Shayad log sambednahin hote jaa rahe hain. Jo sambedanshil hain wo murakh kahlate hai..........

Anonymous said...

we thank chaydukaan to publish this.

Anonymous said...

लग रहा है कि सुधीश पचौरी का पक्ष लेनेवाला एक बेनामी इसमें से विनीत कुमार भी है।

Anonymous said...

vinit kumar kaun hai ye jayda maane nahi rakhta mayene rakhta hai ki kaun kitana naitik hai.anitik logo ka samarthan karne wala kitana naitik hai soch sakte hai... yadi uspe gujarega tab sochata jarur ki naitikta aur anaitikta kya hota hai.o abhi apne swarth me andha ho rakha hai use naukri leni hogi swart naitikta aur anaitikta ki pahchan nahi karane deta hai